चतुर्थोऽध्यायः "ज्ञानकर्मसंन्यासयोगः" श्लोक ०७-०८: Chapter 4 - Verse 07-08

Chapter 4: Verse 07-08
Subject: Time of Incarnation
विषय: अवतरण का समय

यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥४-७॥


Whenever there is a decline of righteousness and up rise of unrighteous, at that time, O Bharat, I manifest Myself.

हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूं अर्थात साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूं। ॥४-७॥

Lesson: The Supreme- Self manifests Himself whenever there is a decline of righteousness and up rise of unrighteousness. (Great personalities are born to lead the people in the moments of moral crisis and spiritual decline)
Subject:  Purpose of Incarnation
विषय: अवतरण का उद्देश्य

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥४-८॥


I manifest Myself, from age to age for the protection of the righteous people; for the annihilation of the miscreants and for the restoration of righteousness.

साधु पुरुषों का उद्धार करने के लिए, पाप कर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूं। ॥४-८॥

Lesson: The Supreme- Self manifests (the great personalities are born) from time to time to reestablish righteousness and protect the righteous persons.

4 comments:

Anonymous said...

मिश्र जी - बहुत अच्छा ब्लॉग है आपका |
यदि बुरा न मानें तो एक सुझाव दूँगी - ऊपर incarnation के लिए सभी जगह - "पुनर्जन्म" नहीं , बल्कि "अवतरण" होना चाहिए |

जब हम अज्ञान में यहाँ आते हैं, बिना किसी तरह के knowledge या purpose के - सिर्फ कर्मफल भोगने को (पोजिटिव या निगेटिव) - उसे जन्म कहते हैं |
किन्तु जब प्रभु आते हैं - तो ज्ञान के साथ कि कहाँ, किस रूप में, और किस उद्देश्य से आ रहे हैं | तब उसे जन्म नहीं - अवतरण कहा जाता है |


भगवान गीता में ही यह भी कहते हैं कि "मैं अपनी प्रकृति को अधीन कर के "प्रकट" होता हूँ - जन्म लेता हूँ नहीं कहते हैं :)|
यदि आपको बुरा लगा हो - तो माफ़ी चाहूंगी - और यह टिप्पणी भी चाहें तो निकाल दें :)

RC Mishra said...

शिल्पा मेहता जी, सुझाव के लिये धन्यवाद, मैने बदलाव कर दिया है। व्याख्या के लिये अलग से धन्यवाद :)

Unknown said...

जब जब होता नाश धर्म का और पाप बढ जाता है
तब लेते अवतार प्रभु और विश्व शांति को पाता है ।

मिश्रा जी आप ने मिलने की इच्छा जाहिर की खुशी हुई, परंतु अभी तो मैं दिल्ली में हूँ । पिछले महीने ही आई हूँ । अब मई में वापिस जायेंगे ।

Alpana Verma said...

Geeta ke shlokon ke bhaavarth jaanNe ka avasar mil raha hai.. bahut accha prayas hai yeh.

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